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ज्ञान गंगा में डुबकी लगाने से हमारे सब दुख दोष और ज्ञान का प्रक्षालन हो जाता है – स्वामी अद्वैतानंद सरस्वती

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Anil Kumar
June 17, 2025
ज्ञान गंगा में डुबकी लगाने से हमारे सब दुख दोष और ज्ञान का प्रक्षालन हो जाता है – स्वामी अद्वैतानंद सरस्वती

चिन्मय मिशन केंद्र जनवृत 5 द्वारा आयोजित छः दिवसीय ज्ञान यज्ञ  में भक्ति रस की गंगा बहा गए।

बोकारो।मंगलवार की शाम को चिन्मय विद्यालय, बोकारो में छह दिवसीय ज्ञान-यज्ञ(अयोध्या काण्ड) का दिव्य पाठ पूज्य स्वामी अद्वैतानंद जी के श्रीमुख से संपन्न हुआ।प्रातकालीन सत्र जिसका विषय धनाष्टकम था जो आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित है। साथ ही चिन्मय विद्यालय में चल रहे अयोध्याकांड ज्ञान योग का भी समापन हो गया।स्वामी अद्वैतानंद जी ने कहा कि किसका जीवन सफल है… किसे धन्य  कहा जाए । स्वामी जी ने कहा सांसारिक जीवन में हम साधारणतया उन्हें धन्य कहते हैं जो विधिवत शिक्षा, अच्छी नौकरी ,धन , मकान, पुत्र इत्यादि प्राप्त कर लेते हैं।  ऐसे व्यक्ति को और धन्य तब माना जाता है जब उनके बच्चे भी उनकी तरह भौतिक समृद्धि प्राप्त करते हैं लेकिन यह समृद्धि के बाद भी एक ऐसा समय आता है। जब व्यक्ति सारी समृद्धि प्राप्त करने के बाद भी एक शून्यता, खोखलापन या आपूर्णता का अनुभव करता है । तो फिर धन्य कौन है, कौन सफल है…। इसका उत्तर देते हुए स्वामी जी ने कहा कि जो आध्यात्मिक दृष्टि से संपन्न है, जिसे शास्त्र ज्ञान एवं वैराग्य की प्राप्ति है जो परमात्मा से एकीकृत प्राप्त कर लेता है । वह धन्य है जो अपने सच्चीदानंद स्वरूप को जान लेता है लेकिन यह प्राप्त कैसे होगा । इसका सहज उपाय बताते हुए स्वामी जी ने कहा सच्चा ज्ञान प्राप्त कर इंद्रियों का शमन।गृहस्थ जीवन की मोह माया को त्याग कर आत्मज्ञान को रसपान करना ।अहम भाव को त्याग कर ईश्वर को समर्पित कर सारा कर्म करना

विविध इच्छाओं को त्याग कर मोक्ष मार्ग की तलाश करें हमेशा हृदय में परमात्मा के प्रकाश को धारण करें ,अपना संसार बंधन ज्ञान से इन्हें काटिए । मुक्ति हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है हम अपने स्वरूप को पहचाने और मुक्त जीवन जिए ।साधु, संत, सिद्ध ,ज्ञानी जन जिन्होंने अपने आत्म स्वरूप को जान लिया है उनके समीप जाकर निरंतर आत्मज्ञान की चर्चा करें । हम सब उन संतो के साथ अपना मन मिलावे जिनका हृदय प्रेम से परिपूर्ण है और जिन्हें निरंतर आत्मानंद की अनुभूति हो रही है । इन संतों के निकट रहने से ज्ञान गंगा में डुबकी लगती रहेगी और हमारे सब दुख दोष और अज्ञान का प्रक्षालन हो जाएगा। हम सब दृश्य जगत और मानसिक विकारों से ऊपर उठे। जिससे कभी अवसाद ,निराशा या भ्रम में ना पड़े ।सांसारिक बंधनों से दूरी, सांसारिक सुखों का त्याग, एवं इंद्रियों पर विजय से ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।संपूर्ण जगत में ईश्वर का ही वास है सभी ब्रह्ममय है । एकीकृत दृष्टि का विकास करें । सभी में परमात्मा का निवास है जाति, धर्म ,पंथ  कुछ नहीं है।  संपूर्ण दृश्यमान जगत ही ब्रह्म से ओत प्रोत है। संपूर्ण सृष्टि ही परब्रह्म का प्रकटीकरण है। हमेशा इसी बोध के साथ जीए।  ज्ञान मार्गी बने तभी आप का जीवन सार्थक और धन्य होगा।अंत में स्वामी जी ने श्रीराम लला कि आरती की जिसमें सभी भक्त गण ने पुरे भक्ति भाव से भाग लिया । सभी भक्तो के स्वामी जी के द्वारा आर्शीवाद स्वरूप पुस्तक भेट की गई एवं सभी को प्रसाद वितरण किया गया स्वामी जी कल नासिक चिन्मया मिशन के लिए प्रस्थान करेगें।ज्ञान-यज्ञ के अंतिम दिन स्वामी जी ने भक्तों को अपने श्रीवचन से श्रीराम-वाल्मिकी संवाद का आध्यात्मिक चिंतन व साधना के विभिन्न रूप में दर्शन कराया। इस ज्ञान-यज्ञ में स्वामी जी ने उस प्रकरण के बारे में बताया जब सुंदर वन देखकर प्रभु श्री राम महर्षि वाल्मिकी के आश्रम पधारे और दोनों महापुरुषों ने एक दूसरे के तेज और ओज को आत्मसात किया। और श्रीराम ने जब महर्षि वाल्मिकी से निवास हेतु स्थान के बारे में पूछा तो कैसे बातों ही बातों में वाल्मिकी जी ने सच्चे भक्त की पहचान बताई। उदाहरणार्थ, जो श्रवण,  चिंतन, मनन, हवन, भजन व अनन्य प्रकार से ईश्वर का ध्यान करे, व जिसके चित्त में ना तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है, ना लोभ है, ना क्षोभ, राग, द्वेष है और ना कपट, दम्भ और माया ही है- हे रघुराज ! आप उनके हृदय में निवास कीजिए। इसी प्रकार वाल्मीकी जी ने श्रीराम को पर्ण कुटी डालने हेतु चैदह स्थान बताए। जिसकी व्यंजना भक्त के निर्विकार हृदय रूप में हुई है। स्वामी जी ने कहा की कोई भी काम बिना विचारे नही करना चाहिए । बिना विचारे काम करने से पछतावा होता है  इस लिए हमेशा कोई काम करने के पुर्व स्वयं हि विचारे । स्वर्गए नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टि में समान हैं, क्योंकि वह जहाॅ-तहाॅ (सब जगह) केवल धनुष-बाण धारण किए आपको ही देखता है और जो कर्म से वचन से और मन से आपका दास है, है रामजी! आप उसके हृदय में निवास करे जो आप से  स्वाभाविक प्रेम करता है उसके मन में निरंतर निवास किजीए अंत में ऋषि बाल्मिकी प्रभु राम से कहते है कि आप के योग्य चित्रकुट पर्वत ही निवास स्थान है जहा गंगा की धारा बह रही है अत्रि और अनसुया आदी अनेक ऋषि निवास करते है जो सतत् योग जप तप से आप का ही ध्यान करते है । परम पुज्य स्वामी जी ने कहा वास्तव में जो भक्त पाचों कर्मेद्रिया पाचों ज्ञार्नेद्रिया मंन बुद्धी विवेक और चित से भगवान का सतत् ध्यान करते है उनके हृदय में ही प्रभु श्रीराम का निवास होता है।

इस अवसर पर अजय नाथ झा उपायुक्त बोकारो मुख्य अतिथि थे उन्हे परम पुज्य स्वामी जी ने स्मृति चिन्ह भेंट की । चिन्मय मिशन बोकारो की आवासीय आचार्या स्वामिनी  संयुक्तानंद सरस्वती, विद्यालय अध्यक्ष बिश्वरूप मुखोपाध्याय, सचिव महेश त्रिपाठी, कोषाध्यक्ष  आर एन मल्लिक, प्राचार्य सूरज शर्मा ,उप-प्राचार्य नरमेन्द्र कुमार एवं हेडमास्टर गोपाल चंद्र मुंशी सहित विद्यालय के सभी शिक्षक, कर्मचारी, छात्र परिषद के सदस्य, एवं चिन्मय मिशन बोकारो चास के सदस्य एवं भक्तगण उपस्थित थे।

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